पाकिस्तान में मुझे काफिर , भारत में पाकिस्तानी कहते है मुझे

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रात-बे-रात महिलाएं उठा ली जातीं, भारत पहुंचा तो मम्मी-पापा और भाई मर गए







Pakistan में मुझे काफिर कहा कहते थे, भारत में मुझे पाकिस्तानी कहा करते थे।

अब मैं क्या करू।





हिंदू सिंह सोढा....



Pakisthan में लोग हमें काफिर कहते थे ।

और भारत में pakisthani.



वहां हमारे साथ मार-पीट होता है।

 खून खराबा होता है।

 जेल में डाला जाता है,

 बहन-बेटियां उठा ली जाती है।

 डर के मारे भारत आए तो यहां लोग मुझे शक की निगाह से देखने लगे। 

वहां हम जमींदार है, 35 कमरों की हवेली है। यहां किराए का कमरा भी मुश्किल से मिलता होता है।



India आने के बाद पिता की कैंसर से मृत्यु हो गई।

 फिर मां चल बसीं और एक साल के बाद भाई साथ छोड़ गया।

 तीन साल के अंदर तीन मौतें हुआ।

बहुत बड़ा सदमा लगा। डिप्रेशन में चला गया था। पूरा परिवार एक एक करके बिखर गया।



 

I am हिंदू सिंह सोढा, राजस्थान के जैसलमेर में रहते है।



 बंटवारे के बाद सबसे बड़ा विस्थापन हुआ जिसमे लाखों जानें गईं,



 लाखों लोग अपना घर-दुआर छोड़कर इधर से उधर गाएं हमारे सारे रिश्तेदार भी भारत चले गए, लेकिन तब हमने pakisthan में ही रहना अच्छा समझा।



पाकिस्तान के थारपारकर सिटी के छाछरो विलेज में हमारा 200 लोगों का परिवार रहता था।



 धन दौलत हर प्रकार से संपन्न थे। राजनीतिक रसूख भी अच्छा-खासा रहता था। 



इसलिए तब हमें कोई दिक्कत नहीं होती थी। काफी years तक हमारा भारत आना जाना रहा था। अपने रिश्तेदारों के यहां आते-जाते रहे थे।





1965 के बाद माहौल बहुत खराब होना शुरू हो गया था । हिंदू मुस्लिम नफरतों का जहर हमारे गांव में भी घुलने लगा था।



 1969 में मार्शल लॉ चीफ administrator जनरल खान का दौर आया। यहीं से हमारा राजनीतिक पायदान भी कमजोर पड़ने लगा था।







Investigetion के नाम पर police हिंदुओं के घरों में घुसकर लोगों को उठाकर ले जाने लगी थी।



 हम वहां अल्पसंख्यकों की voice थे। इसलिए टारगेट पर रहते थे। हमारे परिवार पर भारत की जासूसी करने का आरोप लगने लगा,

धीरे-धीरे चारों तरफ दहशत बढ़ने लगी थी।





एक दिन फैमिली में किसी की मौत हुई। तब मैं 10-12 years का था। 



पुलिस पूछताछ के लिए आई और मेरे cousin को उठाकर ले गई। उनपर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया। लोग कहने लगे कि अब तो इन्हें फांसी हो जाएगी। 



पूरा परिवार सदमे में था। कई दिनों तक मेरे घर में खाना ही नहीं बना, लेकिन कुछ लोगों ने हमारी मदद की। 



जैसे-तैसे वे जेल से बाहर आ गया।



उसी दिन घर में यह तय हुआ कि अब हमे में नहीं रहना है। 



धीरे धीरे करके अपने महिलाओं को उनके घर यानी के मायके यानी जोधपुर या बाड़मेर भेजा जाने लगा। 

दो महीने में घर की सभी महिलाएं भारत चली गईं। घर में सिर्फ पुरुष रह गए थे रहा पर।



8 फरवरी 1971, जैसे ही रात हुई हम सब लोग ऊंट और घोड़ों पर सवार होकर india के लिए रवाना हो गए। हमारे साथ 250 लोगो का जत्था था तब बॉर्डर पार करना इतना मुश्किल नहीं था



 और हमें पूरे रास्ते भी पता थे। फिर भी मन में डर तो था ही।





तीन-चार ग्रुप में बंटकर पूरी रात भर हम चलते रहे। 



अगले दिन सुबह इंडिया पहुंच गए। यहां राजस्थान का बाड़मेर हमारा रहने का स्थान बना। वहां के बाउरी गांव में अपनी झोपड़ी लगाई। एक रात में ही आसमा से जमी पर आ गए ।





उस समय मैं 10वीं क्लास में था। पढ़ाई छूट गई थी। 



पापा के पास भी कोई नोकरी नहीं था। लोग शक की निगाहों से देखते थे।



 जहां भी जाते लोग पाकिस्तानी कह कर बुलाते थे।

 बड़ी मुश्किल से एक ईयर गुजरा। इसके बाद मुझे पढ़ने के लिए जोधपुर भेज दिया गया। वहां से graduation किया और उसके बाद में LLB.







STUDY के दौरान ही मैं राजनीति से जुड़ चुका था। 



धरना-प्रदर्शन और आंदोलनों में जाने लगा था। इसलिए LLB करने के बाद पापा से कहा कि नौकरी नहीं। 





MOTHER नाराज हुईं, लेकिन पापा ने PERMISITION डे दी। उन्होंने कहा जो तुम्हें पसंद वही करो।



 इसके बाद मैं छात्र राजनीति में उतर गया था।





90 के दशक की बात है जब पापा को फेफड़ों का कैंसर का पता हुआ। 



उनकी हालत देखकर मुझे लगने लगा कि अब वे बचेंगे नहीं अब मन ही मन यह सोचने लगा कि अब तक मैं इधर-उधर ही भागता रहा, पापा को कभी वक्त नहीं दे पाया। उनके पास नहीं बैठा पाया



इसलिए तय किया कि अब सारा वक्त है, उसे पापा के साथ ही गुजारना ही है। मैंने सारे काम छोड़ दिवा। इधर-उधर जाना बिल्कुल बंद कर दिया। 





अस्पताल में पापा के बेड के पास ही रहने लगा बिस्तर लगा लिया। दोनों खूब बातें करने लगे।





एक दिन पापा कहने लगे विभाजन की बड़ी लहर आने वाली है। 1947, 1971 के बाद फिर से लोग भरी मात्रा में भारत आएंगे। तुम उनके लिए कुछ काम करना। मैंने पापा से वादा किया कि मैं उन लोगों के लिए ही काम करूंगा।





6 महीने बाद पापा की EXPIRE हो गई। इसके बाद मैने जोधपुर, बाड़मेर और जैसलमेर जैसे शहरों में पाकिस्तान से आ रहे लोगों से मिलने लगा। उनकी परेशानियां समझने की कोशिश करने लगा। शुरुआत में तो कुछ पता ही नहीं चलता कि करना क्या है, बॉर्डर पार से आने वालों लोगों की PROBLEMS क्या हैं।



कुछ समय या महीने बाद समझ में आया कि ज्यादातर लोग वो हैं जिनके घर की FEMALE को खतरा है। इसी कारण से वे लोग PAKISTHAN से भाग करके भारत आने के लिए विवास हो रहे हैं। 





इसी बीच मम्मी की देहांत हो गया।

इसके सदमे से उबरा नहीं था कि छोटा भाई दुनिया से चला गया ।



एकाएक सबकुछ पूरा बिखर गया। कई महीने डिप्रेशन में रहा फिर उसके बाद बेंगलुरु में इलाज कराया तब जाकर ठीक हुआ। फिर अपने मिशन में जी जान से लग गया।



मुझे उस समय का एक किस्सा याद आ रहा है। जब राणा राम नाम का एक आदमी मुझसे मिलने आया उसकी गोद में छोटे-छोटे बच्चे थे। Pakisthan में उसकी wife को कुछ लोग उठाकर लेकर चले गए थे, 



उसने हर जगह गुहार लगाई। कई महीनों तक इधर-उधर ढूंढा,







उसने हर जगह गुहार लगाई। कई महीनों तक इधर-उधर ढूंढा, 



लेकिन कहीं कुछ पता नहीं लगा। फिर एक दिन उसे एक तस्वीर दिखाई गई। जिसमें उसकी पत्नी को बुर्का पहने हुई थी, नमाज पढ़ रही थी। 



इसके बाद वह परेशान होकर अपने बच्चियों के साथ वह भारत आ गया। ऐसे कई केस मुझे मिले। उनकी कहानियां सुनाने बैठूं तो समय कम पड़ जाएगा।





उसी तरह जनता माली का केस को भी मैं कभी नहीं भूल पाता। वह अपने पति के साथ भारत आ रही थी। परिवार को तो आने दिया गया, लेकिन उसे पाकिस्तान में ही रोक लिया था । उसके बाद उसका कुछ पता ही नहीं चला।



Pakisthan के संविधान से लेकर संसद तक minorty की कहीं सुनवाई नहीं। एक रिपोर्ट के मुताबिक हर साल आज भी वहां एक हजार अल्पसंख्यक महिलाएं लापता होती हैं। घर में तेज आवाज में aarti नहीं कर सकते। मंदिर तोड़ दिए जाते थे, घर में जबरदस्ती घुसकर भगवान की मूर्तियां तोड़ी जाती हैं। 



नौकरियां तो दूर की बात है इन्हें काम तक नहीं दिया जाता है। आज भी








जब मैं इनके लिए काम करने लगा तो पहली बार 1998 में पूर्व राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत ने हमारी बात को सुना ।

इसके बाद 2004 में 13 हजार लोगों को नागरिकता मिली। जब सुषमा स्वराज जी विदेश मंत्री हुआ करती थीं, तो उन्होंने भी बहुत जायदा मदद की।



राजस्थान की पूर्व CM वसुंधरा जी और अभी के सीएम अशोक गहलोत जी ने भी हमारी मदद की। नागरिकता की बढ़ाई गई फीस को कम कर दी, लेकिन अभी भी बहुत जायदा मुश्किलें होती है।







नागरिकता दिलाने के लिए रिश्वत मांगने की शिकायतें हमारे पास आती हैं। इनकी महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं भी होती रहती है।इसी वजह से जुलाई 2020 में पाकिस्तान से आए हिंदू के एक परिवार के 11 लोगों ने SUCIDE की थी।



हाल के दिनों में बॉर्डर पर कड़ी सुरक्षा और थार एक्सप्रेस बंद होने के बाद PAKISTHAN से आने वाले लोगों की संख्या में कमी घटी है। इसके बाद भी करीब 25 हजार लोग ऐसे हैं, जिन्हें नागरिकता नहीं मिली है। इसमें हिंदुओं के साथ ईसाई और दूसरे अल्पसंख्यक हैं।



मैं PAKISTHAN से आने वाले लोगों की मदद करता हूं। 



उन्हें खाने-पीने की चीजें PROVIDE करता हूं। उनके बच्चों को एजुकेशन दिलवाता हूं।

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